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बुधवार, 17 मार्च 2010

डॉक्टर का पत्र पत्नी के नाम (पुरस्कृत कविता)

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मेरी प्यारी एन्टीबायोटिक
सरला स्वराज
सुबह, दोपहर, शाम
प्यार की
तीन मीठी सी खुराक
डरता हूँ
इसलिए
विनम्र निवेदन करता हूँ
मुझ गरीब से तुम
क्यों दूर रहती हो इतना
स्टेन्डर्ड कम्पनी की महंगी दवाई
रहती है मुझसे जितना
मैं तुम्हारे प्यार का
हार्ट पेसेन्ट हूँ
सेन्ट परसेन्ट हूँ
ऐसा डॉक्टर ने बतलाया है
क्योंकि
एक्सरे में तुम्हारा चित्र
स्पष्ट नजर आया है
तुम्हारी जुदाई मुझे
ब्लड टेस्ट की सुई सी चुभ रही है
यह दूरी मुझे
दर्द निवारक इंजेक्शन की तरह
सहन नहीं होती
काश !
तुम मेरे पास होतीं ।
डॉक्टर की टॉर्च की तरह चमकती
तुम्हारी आँखें
स्टेथिस्कोप सी फैली
लचकदार बाँहे
रूई के फाहे की तरह
कोमल स्पर्श तुम्हारा
और
तेज बुखार में
थर्मामीटर की तरह बढ़ता
तुम्हारा
गुस्से का पारा
हमको भाता है
बहुत याद आता है ।
तुम
मायके जाने की खुशी में
गर्म पानी की थैली में भरे
पानी के समान
फूल रही हो
और मैं
तुम्हारी याद में
ग्लूकोज चढ़ रही
बोतल के समान
पिचकता जा रहा हूँ
चिपकता जा रहा हूँ ।
सच कहता हूँ
तुम मेरी
सभी रोगों की
एन्टीबायोटिक दवा हो
तुम्हारी कसम
तुम हो मेरे लिए
स्वर्ण भस्म ।
तुम
हमारी आपसी नोंक-झोंक को
अब भूल जाओ
और इसे
कैंसर या एड्स की तरह
लाइलाज मत बनाओ
अब लौट आओ
अब लौट आओ
अब लौट आओ।

घरेलू मंत्रीमंडल

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नई बहू
जब ससुराल आई तो
सास फूली नहीं समाई
लेकिन
भविष्य में बहू हावी न हो
सोचकर सास घबराई
तो उसने
कूटनीति से काम लिया
भारतीय नेताओं को आदर्श मान लिया
और
बहू से कहा
सुनो स्नेहा
मेरे पास इस घर का वित्त मंत्रालय है
तुम्हारे ससुर ने गृह मंत्रालय चुना है
बेटी योजना मंत्री और
छोटा बेटा विदेश मंत्री बना है
तुम्हारे पति ने
खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री की भूमिका निभाई है
लेकिन
तुम कौन सा विभाग संभालोगी
अपनी योजना
अभी तक नहीं बताई है
तुम हमारी बहू हो
इसलिए
स्वयं अपना विभाग चुनो
हमने
यह अधिकार तुम्हें दिया है
चतुर बहु ने तुरन्त कहा
अब मंत्रीमंडल में कुछ नहीं बचा है
इसलिए
मैंने विपक्ष में बैठना पसंद किया है ।

फिल्मों का असर

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कमला ने
विमला से कहा
मुझे
फिल्म देखने से डर लगता है
सुना है
महिलाओं पर इसका
बुरा असर पड़ता है
क्योंकि
जब मैंने देखी थी फिल्म
“राम और श्याम”
मेरे होश उड़ गए
एक साथ
दो लड़के हो गए
सुनते ही विमला ने
कमला की बात को प्रमाणित करते हुए
अपनी चुप्पी तोड़ी
और
धीरे से बोली
मेरी तो मारी गई थी मती
मैंने भी देखकर फिल्म
“गंगा, यमुना और सरस्वती”
इस बात को परख लिया
क्योंकि
मुझे भी हुईं थीं
एक साथ तीन लड़कियाँ
यह सुनकर
पास खडी रानी
सुनाने लगी अपनी कहानी
और
मचाते हुए शोर
बोली
हाय राम
मेरा क्या होगा
मैंने तो देखी थी फिल्म
“अली बाबा और चालीस चोर” ।

कुकर

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कुकर में
चावल चढाने के बाद
पतिदेव घंटों खड़े रहे
सीटी के इंतजार में अड़े रहे
मगर
सीटी नहीं आई
तभी
बाजार से उनकी पत्नी आई
पत्नी के आते ही
कुकर ने
तुरन्त सीटी बजाई
यह देख
पतिदेव गुस्से में बोले
आजकल के
लड़के तो लड़के
कमबख्त
कुकर भी
अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं
पत्नी के आते ही
तुरन्त सीटी बजाते हैं ।

पुलिस का हाथ

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दरोगा ने
फोटोग्राफर से कहा
सुनो मित्र
मेरा
खींचो एक चित्र
और
खड़ा हो गया केमरे के सामने
मूँछे तानकर
जेब में हाथ डालकर
यह देख मैंने
तुरन्त
फोटोग्राफर को रोका
दरोगा जी को टोका
और कहा
बात है बड़ी विचित्र
आप और चित्र
वह भी
जेब में हाथ डालकर
जब यह चित्र
जनता के बीच जाएगा
आम आदमी इसे पचा नहीं पाएगा
इस प्रकार
चित्र खिंचवाना
आपको शोभा नहीं देता है
क्योंकि
पुलिस वालों का हाथ
अपनी जेब में नहीं
दूसरों की जेब में होता है ।

ड्यूटी पर

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मेले में
अकेले में
खडी थी एक लड़की
तभी
एक आदमी आया
आते ही उसने
लड़की को हाथ लगाया
यह देख
दूर खड़े
उसके कुछ साथी
मुस्कुराने लगे
कुछ तो
वन्स मोर, वन्स मोर
चिल्लाने लगे
धीरे-धीरे
भीड़ बढ़ गई
छोटी सी बात
राई का पहाड़ बन गई
भीड़ देखकर
मैं भी वहां पहुँचा
और
दृश्य देखकर चौंका
एक पुलिस वाला
समाज का सेवक होकर
सुरक्षा चक्र को भेदने का
दुष्टतापूर्ण और घिनोना
प्रयास कर रहा था
भोली-भाली लड़की को
दिन के उजाले में
छेड़ रहा था
यह देख
मैंने हवलदार से कहा
हे प्रजातंत्र के
स्वतंत्र सिपाही
पुलिस विभाग के नियमों को
तोड़ने की कसम
आपने क्यों खाई ?
आपको, ऐसा करते
जरा भी लाज नहीं आई
माना
कानून आपके हाथ में है
लेकिन
क्या जनता आपके साथ में है
अरे
तुम तो
पुलिस वाले हो
जनता के रक्षक हो
तुम्हें
ऐसा नहीं करना चाहिए
अपने
अधिकारियों से डरना चाहिए
वह बोला
हम तो
कभी-कभी मजा लेते हैं
लेकिन
हमारे अधिकारी तो
हमेशा ही ऐसा करते हैं
इसलिए
हमें कोई डर नहीं है
फिलहाल हम
ड्यूटी पर नहीं हैं ।

दाँत का डॉक्टर

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पिता ने
पुत्र का कान ऐंठा
और कहा
सुनो बेटा
मन लगाकर पढ़ोगे
तो
निश्चित ही
मेरी तरह डॉक्टर बनोगे
पुत्र बोला
ठीक है
लेकिन
यह तो बताओ
मैं कौन-सा रास्ता चुनुं ?
दिल का डॉक्टर बनूं
या
दाँत का डॉक्टर बनूं
देते हुए सलाह
अनुभवी पिता ने कहा
बेटा
एक बात का ध्यान रखना
केवल
दाँत का डॉक्टर ही बनना
जिज्ञासावश
पुत्र फिर बोला
दाँत का ही क्यों ?
दिल का क्यों नहीं ?
पिता ने कहा
बेटा
ऐसी कोई बात नहीं है
दरअसल ऐसा होता है
दाँत के केस में
कोई रिस्क नहीं होता है
क्योंकि
दाँत तो बत्तीस होते हैं
लेकिन
दिल एक ही होता है ।

दूसरी शादी

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पत्नी से तंग आकर
पति ने कहा
सुनो
मैं दूसरी शादी करने चला
पत्नी बोली
क्या बकते हो
मर्यादा का
जरा भी ध्यान नहीं रखते हो
पहली पत्नी के रहते
दूसरी शादी करते हो
वैसे तो
इसके लिए
कानून भी मना करता है

फिर
दूसरी शादी करने के लिए
तुम्हारा मन
क्यों मचलता है
सुनकर यह बात
पति ने कहा
मैं तो
दूसरी ही कर रहा हूँ
राजा दशरथ ने तो
तीन शादियाँ की थीं ....
पत्नी ने सुनकर
पति की यह बात
पति को पहुँचाया आघात
दी धमकी
और कहा
यदि तुमने
ऐसी-वेसी हरकत की तो पछताओगे
अभी तो
एक के हो
फिर कहीं के नहीं रह जाओगे
अरे
राजा दशरथ तो
तीन पत्नियों के पति थे
लेकिन
तुम भी
यह बात याद रखना
द्रौपदी के पाँच पति थे ।

तुलादान

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हमने
दुकानदार को एक रूपये का
सिक्का देते हुए कहा
टॉफी देना भाई
दुकानदार बोला
आपको एक रूपये का सिक्का दिखाते हुए
जरा भी शर्म नहीं आई
ऐसा कीजिए
टॉफी फ्री में ले लीजिए और
इसे जेब में रख लीजिए
जेब में वापिस रखने का कुछ नहीं लगता है
यह सिक्का अब नहीं चलता है
तभी एक भिखारी दिखा
मैंने वह सिक्का
भिखारी को दिया
भिखारी ने कटोरा हटा लिया
मुझे ऊपर से नीचे तक देखा
और कहा
पैरों में बूट
बदन पर सूट
गले में टाई कसते हो और
जो चलन से बाहर है
ऐसा सिक्का क्यों देते हो
शर्म आना चाहिए
अरे
देना है तो
कागज का नोट दो
पुराना नोट भी हम खुशी से लेंगे और
बदले में ढेरों आशीष देंगे
पर यह कलदार नहीं लेंगे ।
मैंने सिक्का उठाकर देखा
और सोचा
यह तो कागज के नोट की तरह
कहीं भी नहीं फटा है
और भिखारी
सिक्का न लेने पर डटा है
सरकार प्रतिदिन नए सिक्के छाप रही है और
भिखारी को लेने में शर्म आ रही है
इसलिए
सिक्का न चलने का कारण
सिक्के से ही पूछता हूँ ।
जब मैंने
सिक्के से पूछा
तुम चलन से बाहर क्यों हो गए हो
व्यर्थ में ही सरकार की छाती पर
मूंग दल रहे हो
तो
दु:खी मन से सिक्का बोला
बाबूजी
हम पूरी तरह राजनीतिक हो गए हैं
इसलिए
चलन से बाहर हो गए हैं
और
यह तो एक परम्परा बन गई है
जब से नेताओं का
सिक्कों से तुलादान होने लगा है
सिक्कों की पूरी कौम ही
चलन से बाहर हो गई है ।

आइडिया

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एक भिखारी का बाप मर गया
भिखारी बोला
कमबख्त
गरीबी में आटा गीला कर गया
चौराहे पर बैठता था
दस-पाँच रूपये रोज कमाता था
घर का खर्च तो
वैसे भी नहीं चल पाता था
अंतिम संस्कार कैसे करूं
तन पर लंगोटी भी नहीं जो गिरवी धरूं
तभी
उसके दिमाग में एक आइडिया आया
उसने
रात के अंधेरे में
बाप की लाश को
बीच चौराहे पर फिंकवाया
अगले दिन
पुलिस ने एक्सीडेन्ट समझकर
लाश को लावारिस घोषित कर दिया
और
सरकारी खर्चे पर
लाश का अंतिम संस्कार कर दिया ।