ब्लॉग देखने के लिए हार्दिक धन्यवाद। यदि आपको मेरा ब्लॉग अच्छा लगा है तो आप मेरे समर्थक (Follower) बनकर मुझसे जुड़ें। ई-मेल sudhir.bhel@gmail.com मोबाइल 09451169407, 08953165089

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नव वर्ष की बधाई

0 टिप्पणियाँ

हमारे एक मित्र
हैं बड़े विचित्र
एक जनवरी को हमसे बोले -
"चक्र" जी
नव वर्ष की बधाई !
हमने कहा
बड़े अजीब हो,
बिना सोचे समझे ही बधाई
आपको
देने मै ज़रा भी शर्म नहीं आयी ?
अरे,
नव वर्ष जब भी आता है
केवल
वर्ष ही तो नया रहता है
लेकिन
समस्याएँ पुरानी दोहराता है !
समस्याओं की श्रेणी में
प्रथम क्रमांक
रोटी का आता है
विश्वाश करो,
एक दिन तो ऐसा आएगा
जब
मोनो एक्टिंग करके
कोरी कल्पना से पेट भरना होगा,
तब
हम अपने बच्चों को बताएंगे
कि
रोटी एक इतिहास है
और
उसकी कहानियां सुनाएंगे !
यह सुनकर
हमारे बच्चे भी
रोटी के भूतकालीन अस्तित्व पर
विशवास नहीं कर पाएंगे !
मेरे भाई,
बधाई का क्या है -
नव वर्ष की
सिर्फ निष्ठा बदल जाती है
और
मौक़ा देखकर
उसकी भी नीयत बदल जाती है !
जिस दिन
महंगाई कम हो जाएगी
उस दिन मैं
घी के दिये जलाऊंगा
और
सच मानो
आपको नव वर्ष की बधाई देने अवश्य आऊँगा |

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

माँ-बाप का साथ

1 टिप्पणियाँ

पुरानी सोच
और
पुराना घर
कहां तालमेल खाते हैं
जब
मत भिन्न हों
तो
मन भी भिन्न हो जाते हैं

अपनेपन को खत्म करके
नयेपन को प्राथमिकता देना
कहां की समझदारी है
इसलिए
पिता द्वारा रोपे गए
जिस नीम के पेड़ को
तुम
कटवाने की सोच रहे हो
वह विचार त्याग दो
क्योंकि
नीम की छांव
पिता का साया बनकर
तुम्हारे साथ रहेगी

भित्तियाँ तुडवाकर
दीवारें बनवाना तो
समझ आता है
लेकिन
सपाट दीवारें
समझ से परे हैं
जिन पर टंगेगीं
मॉडर्न आर्ट
जिसे
अबूझ पहेली की तरह
समझा नहीं जा सकता
और
आदिवासी चेहरों की पेंटिंग
चीनी ड्रेगन
या
फेंगशुई की लटकी होंगी घंटियाँ

इस तरह
ड्राइंगरूम की आधुनिक शोभा
केवल लटकी रहती है
और
लटकना आत्महत्या का प्रतिरूप है

समय के साथ
बदलाव आवश्यक है
लेकिन
सबकुछ बदलकर
भूगोल तो मिट सकता है
पर
इतिहास नहीं
क्योंकि
इतिहास मस्तिष्क में होता है
इसलिए
एक सुझाव और दूँ
नये घर में
सपाट दीवारों के साथ
कोने में ही सही
एक आला रहने दो
जहां
दीपक की रोशनी बनकर
माँ हमेशा तुम्हारे साथ होगी।

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

नारी अंगों का प्रदर्शन

1 टिप्पणियाँ

तुम
चर्चित हो
कौन नहीं जानता तुम्हें
लोग जाते हैं देखने
तुम्हारी प्रदर्शिनी
जहां होता है केवल
नारी अंगों का प्रदर्शन
तुमने
जगतजननी नारी को निर्वस्त्र दिखाया है
उसके वास्तविक उभार और
परिपक्वता का
चरित्र हनन किया है
क्या यह
कोई अन्वेषण है तुम्हारा ?

अविकसित शरीर में
विकसित अंगों का
अशोभनीय प्रदर्शन
विवश करता है सोचने को
कि
क्या तुम्हें भी
एक नारी ने ही जन्म दिया है ?
मुझे तो लगता है 
तुमने
किसी नारी नहीं
अपितु अपनी
माँ, बहिन और
बेटी को ही
अपने हाथों निर्वस्त्र किया है

जिस स्त्री के स्तनों का
उभार तुमने दिखाया है
वह तुम्हारी माँ ही है
क्योंकि
स्तनों का उभार तो
तुमने अपने शिशुकाल में
माँ द्वारा कराए गए
स्तनपान के समय ही देखा था

यह भी समझ आ रहा है
कि
नारी के अविकसित अंगों की
समय से पहले परिपक्वता को दर्शाना
तुमने
अपने सामने बड़ी हो रही
बहिन को देखकर ही किया है

सच-सच बताओ ?
तुमने
अपनी माँ और बहिन का ही चित्रण किया है ना
बोलो !


अब इसके बाद
अपनी पत्नी और बेटी का भी
क्या ऐसा ही प्रदर्शन होगा ?
ये सामने की तस्वीर
जिसमें लड़की की नाभि और
लगभग पूरी खुली हुई टांगे
कंधों से उतरता बड़े गले का टॉप
यह सब तो
पश्चिमी सभ्यता की पक्षधर
तुम्हारी प्यारी बिटिया को ही तो पसंद है
बोलो !
क्यों चुप हो


पश्चाताप से झुका हुआ सिर
तुम्हारी स्तबधता और
बंधी हुई बत्तीसी देखकर
मैं समझ गया
कि
अब तुम कुछ नहीं बोलोगे
क्योंकि
जड़ हो गए हो।

रविवार, 18 नवंबर 2012

लंबा मौन

0 टिप्पणियाँ

लंबे समय तक
मौन
निश्चित विनाश का संकेत है
सौहार्दपूर्ण वातावरण
कभी भी
चढ‌ सकता है
आंतकियों के मस्तिष्क में
कट्टरपंथी
सेंक सकते हैं रोटियाँ
तुम्हारे-हमारे बीच
शांत इलाकों में
कभी भी
लग सकता है कर्फ्यू
केवल दो लोग
अनगिनत लाशों के
ठेकेदार हो सकते हैं
उन लाशों के
खुदा के बंदों को
बनाकर मोहरा
चलते हैं शकुनि चालें
और
हँसते हैं कुटिल हँसी
जेम्स वाट ने
रेल का इंजन बनाया
और
एडीसन ने
असफलता से
सफलता पाकर
बल्ब का आविष्कार किया
कट्टरपंथी मजहबी लोग भी तो
आविष्कार ही करते हैं
एक बम से
अधिक से अधिक
कितने लोग मर सकते हैं| 

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

सिल्वर अवार्ड प्राप्त

0 टिप्पणियाँ

दिनांक 30 सितम्बर 2012 को वाराणसी के School of Management Science (SMS) College में आयोजित 23rd Quality Circle Forum of India (QCFI) Convention के भव्य समारोह में "सिल्वर अवार्ड" लेते हुए दांये से तीसरे स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"। 


 

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

अंधेरा

0 टिप्पणियाँ

अंधेरा
बंद सांकल को घूरता है
और
करता है प्रतीक्षा
आगंतुक की
द्वार भी
सहमे हुए से
चुपचाप
एक-दूसरे का सहारा बनकर खडे‌ हैं

सुनसान अंधेरे में
ध्वनि
तालाब में फेंकी
कंकडी के  घेरे सा
विस्तार ले गई
अनंत को ताकता
शून्य
चेहरे की सलवटें
कम करने की कोशिश में व्यस्त है

अंधेरे में पड‌ते
पदचाप
स्पष्ट गिने जा सकते हैं
सांकल का स्पर्श
और
बंद दरवाजों को धक्का देकर
आगे बढ़ते पदचाप
अंधेरे सूनेपन को
खत्म करने का
प्रयास कर चुके हैं

आधी रात को
इतने अंधेरे में
न जाने
कौन आया होगा
निश्चित ही
जानता होगा अंधेरा
प्रतीक्षा तो
उसने ही की है
अंधेरा
चालाक है
तिलिस्मी है
नहीं है कोई आकृति उसकी
फिर भी
टटोल-टटोलकर
बढ़ता है आगे
उस छोर की ओर
जिसका
कोई पता नहीं
क्योंकि
इसके विस्तार का क्या पता
और
वैसे भी
तय किए गए फासले से
दूरी का पता नहीं चलता
क्योंकि
अंधेरे को
स्पर्श ही नाप सकता है

शोषण करता हुआ अंधेरा
पराक्रमी होने का ढिंढोरा पीटता है
..... ? ? ? ?
अरे!
क्या हुआ?
क्यों सिकुड़ने लगे
जानता हूँ
नहीं स्वीकारोगे तुम अपनी हार
भोर जो होने वाली है।