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मंगलवार, 27 मार्च 2012

चटकनी

7 टिप्पणियाँ

दरवाजे

हर रोज

अनगिनत बार

चौखट से गले मिलते हैं

साक्षी हैं कब्जे

इस बात के

जो

सौगंध खा चुके हैं

दोनों को मिलाते रहने की

जंग लगने पर

कमजोर हो जाते हैं कब्जे

और

चर्र-चर्र ......

आवाज करते हुए

कराहते हैं दर्द से

फिर भी

निःस्वार्थ भाव से

दोनों को मिलाते रहने का क्रम

जारी रखते हैं

जलते हैं तो

गिट्टक और स्टॉपर

मिलन के अवरोधक बनकर

कहने को अपने हैं

सहयोग करती है

हवा

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

ललकारती भी है

गिट्टक और स्टॉपर को

और

चौखट से दरवाजे का

मिलन हो न हो

जारी रखती है प्रयास

उससे भी महान है

चटकनी

जो

ढूँढती है मौका

दोनों के प्रणय मिलन का

और

खुद बंद होकर

घंटों मिला देती है दोनों को।

सदी के हत्यारे

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नेता

अमानवीय कृत्यों की

पराकाष्ठा हो तुम

तुम्हारा

छल-छद्म देखकर

भेडियों ने आत्महत्या कर ली

तुम

बोलते नहीं

आग उगलते हो

तुम्हारा

मौन रहकर मंथन करना

निश्चित

विनाश का संकेत है

तुम्हारा

कौवे सा सयानापन

सबूत है

तुम्हारे काने होने का

बेवकूफ हैं वे

जो

करते हैं वर्ष भर इंतजार

नाग-पंचमी पर दूध पिलाने का

इसके अलावा भी

तीन सौ चौंसठ दिनों का

विकल्प है उनके पास

सच तो यह है

कि आज

गलतफहमी में जीता है समाज

क्योंकि

जो शांति के उपासक घोषित हैं

वे ही

इस सदी के हत्यारे हैं।

सीमित दायरा

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महीनों हो गए

पडो‌स का मकान खाली है

कोई

रह भी रहा हो तो

पता नहीं

बंद दरवाजे

कहाँ बताते हैं

बगल में कौन रहता है

वे तो मूक हैं

इस तरह

कंक्रीट वाले जंगलों के बीच

महानगरों में रहने वालों की जिंदगी

दस-बाई-दस के कमरों से लेकर

चार-बाई छः की

कार तक ही सीमित है

जो

भागती रहती है

कोलतार की गर्म सड‌कों पर

या

बीतती है बंद कमरों में

इनके

दिन की शुरूआत होती है

ताला बंद करने से

और

खत्म होती है

देर रात को

ताला खोलने तक

बंद दरवाजे के भीतर

दम-घोंटू वातावरण

ताला खोलते ही

भयानक अंदाज में अहसास कराता है

अपने आपको

कैद से मुक्त कराने का

और

करता है

जानलेवा प्रयास

ताकि

कल तुम ऐसा न करो

फिर भी नहीं मानते

महानगरों में बसने वाले लोग

क्योंकि

सीमित हो चुका है उनका दायरा

और

वे इस दिनचर्या रूपी

नशे के आदी हो चुके हैं।

उम्मीदें क्यों ?

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क्यों बिलोता हूँ कीचड़

शायद इसलिए

दूध की तरह

उफान न आए

क्यों लिखता हूँ

रेत पर अपने छंद

शायद इसलिए

कोई इतिहास बन जाए

क्यों देखता हूँ आईना

शायद इसलिए

चेहरे पर अपने

भरोसा नहीं

क्यों मौन हूँ

शायद इसलिए

वाणी चुर (चुराना) न जाए

क्यों रहता हूँ फटेहाल

सुदामा की तरह

शायद इसलिए

कृष्ण, मुझे भी अपनाएँ

क्यों है

सूरज से दोस्ती की लालसा

शायद इसलिए

रोशनी कहीं

अँधेरों में न सिमट जाए

क्यों लगाए हैं कैक्टस

शायद इसलिए

यमराज के आने का डर है

क्यों डर है रिश्तों से

शायद इसलिए

खून अपना

तुरूप की चाल न हो

यह सारी उम्मीदें क्यों

शायद इसलिए

असंभव

संभव हो जाए।