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बुधवार, 19 जून 2013

पत्नी का फोटो

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एक दिन दफ्तर में
मेरी एक मात्र पत्नी का
बिना सूचना के आगमन हुआ
उसके चेहरे पर गुस्सा देख
मुझे
तूफान के पहले की
आंधी का आभास हुआ
अचानक
उसका हाव-भाव बदल गया
गुस्से से लाल चेहरा
फूल सा खिल गया
उसका
पाकिस्तान की तरह
इतनी जल्दी बदलाव
मेरी समझ में नहीं आया
जब मैंने इसका कारण पूछा
तो
मुस्कुराकर बोली
हे मेरे प्राणनाथ
मैं आपको कितना गलत समझती थी
आपकी टेबिल पर
सुन्दर फ्रेम में जड़ी हुई अपनी फोटो देखकर
मुझे आज पता चला
आप यूँ ही आहें नहीं भरते हैं
मुझसे कितना प्यार करते हैं 
पति बोला
यह तुम्हारा भ्रम है
टेबिल पर तुम्हारी
फोटो लगाने का तो दूसरा ही कारण है
तुम तो जानती हो कि
मैं जनसम्पर्क अधिकारी हूँ
प्रतिदिन
अच्छे और बुरे लोगों से
मेरा पाला पड़ता है
किसी-किसी दिन तो
लड़ना भी पड़ता है
तब किसी काम में नहीं लगता है मन
इसलिए हो जाती है टेंशन
तुम्हारी
फोटो पास रहेगी तो
यह आभास होगा
क्या
तुमसे भी बड़ा कोई टेंशन होगा
इस तरह
टेंशन की समस्या सुलझ जायेगी
और
मेरी नौकरी आराम से कट जायेगी।

धारा

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एक महिला
भागते-भागते थाने में आयी
और बोली
दरोगा जी
कुछ आवारा लड़के
बाहर खड़े हैं
मेरी आबरू लूटने के पीछे पड़े हैं
दरोगा बोला
जब तुम सही जगह आयी हो
तो फिर
क्यों घबरायी हो
अब बिल्कुल चिंता मत करो
हम उनपर कोई भी धारा लगा देंगे
जिंदगी भर जेल में सड़ा देंगे
इसलिए
वो तुम्हारा कुछ नहीं करेंगे
जो करना है
हम ही करेंगे।  

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

आना फ्री-जाना फ्री

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आना फ्री-जाना फ्री 

सरकारी एवं सामाजिक व्यवस्थाओं और समस्याओं को हास्य के पटल पर उकेरती रचनाओं का जोरदार हास्य व्यंग्य-संग्रह

क्यों ?

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 क्यों ?

कविताओं के माध्यम से विभिन्न पहलुओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने वाला काव्य संग्रह 

साहित्यकार

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साहित्यकार

काव्य श्रंखला का अनूठा सहभागी काव्य संग्रह

गुरुवार, 7 मार्च 2013

स्त्री-पुरूष

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तुम (पुरूष)
सहज सकते हो
केवल
अपना अहम्
वह (स्त्री) सहेजती है
पीड़ा‌ और दर्द

पुरूष शब्द
तुम्हारे मस्तिष्क
और
तुम्हारी सोच को
खाली कर चुका है
विपरीत इसके
स्त्री भरी रहती है हमेशा
अपनी आँखों में आँसू
क्योंकि
इकठ्ठा करना जानती है वह

भरी रहती हैं हमेशा
उसकी दोनों आँखें
इसलिए तो
पलकें नम रहती हैं
और
उसके सुख
जगह नहीं मिलने पर
लौट जाते हैं खाली हाथ

पुरूष से स्त्री का
भेद सिर्फ इतना है
कि
स्त्री
वह शब्द है
जब
कहा जाए
परिभाषा लिखो दुःख की
तो
मात्र एक शब्द ही पर्याप्त है
स्त्री


महिला दिवस पर विशेष

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            महिला दिवस पर मेरी ओर से नारी शक्ति को हार्दिक शुभकामनाएँ।
 
मेरा एकमात्र प्रश्न यह है कि हमें महिला दिवस क्यों मनाना पड़ रहा है? इसका उत्तर भी मैं ही देना चाहता हूँ। इस दिवस को मनाने का तात्पर्य यह है कि महिलाओं को अहसास कराया जाए कि वह एक महिला हैं। जबकि हम बात करते हैं कि सभी महिला और पुरूष कंधे से कंधे मिलाकर चलें और आज सभी को समान अधिकार मिले हुए हैं तब एक अलग दिवस मनाने कि क्या आवश्यक्ता है?
 
आप इस बात का स्मरण करें कि एक विकलांग व्यक्ति है। वह प्रतिदिन अपनी दैनिक दिनचर्या के सभी कार्य भलीभांति करता है इसलिए वह यह भूल चुका है कि वह विकलांग है। लेकिन जब भी वर्ष में एक बार विकलांग दिवस मनाया जाता है तब उसे अहसास होता है कि मैं विकलांग हूँ। ठीक इसी प्रकार से जब बराबरी की बात की जाती है तब महिलाओं को क्यों अहसास कराया जाता है कि वह महिला हैं? यह परम सत्य है कि वह महिला हैं किंतु सृष्टि के इस सच को दोहराने की क्या आवश्यक्ता है?  
            आज महिलाओं के विषय में जो तर्क दिये जाते हैं वह बेमानी साबित हो रहे हैं। मैं केवल एक ही तर्क रखता हूँ उस पर जरा सोचिए- कि नारी को आप किस रूप में मान्य करते हैं? नारी अभिशाप है अथवा वरदान? मत भिन्न हो सकते हैं पर निःसंदेह जो भी जीव अथवा निर्जीव किसी को कुछ देता है तो वह वरदान ही हो सकता है अभिशाप नहीं। नारी ने ब्रह्माण्ड की अमूल्य धरोहर मानव शक्ति को जन्म दिया है। नारी जब हमें कुछ दे रही है तब वह वरदान ही है। ऐसे पुरूष जिनकी सोच का दायरा नारी के प्रति सीमित है उनके लिए मैं कहना चाहता हूँ कि वह यदि सीता जैसी पत्नी चाहते हैं तो अपने आचरण में राम जैसे संस्कार भी लाएँ।

अंत में अपनी बात को विराम देने से पहले यह कहना चाहता हूँ कि महिलाओं का सम्मान मात्र महिला दिवस और कागजों तक ही न रहे। अपितु नारी के सम्मान को अपने जीवन में आत्मसात करके संकल्प लें कि केवल महिला दिवस के दिन ही नहीं बल्कि प्रत्येक दिन नारी का सम्मान हो। मैं दावा करता हूँ कि आप प्रयास तो कीजिए आपकी भावनाएँ स्वतः ही बदल जाएंगी।

 

 

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

मैं और तुम

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मैं और तुम
अलग-अलग बिंदुओं से
शुरू होकर
रेल की पटरी की तरह
समानांतर चल रहे हैं
लेकिन
ऐसा क्यों
और
कब तक
क्यों न हम
एक-दूसरे पर लम्ब डालकर
सदा के लिए गले मिल जाएं
और
एक हो जाएं।

हिन्दी में उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित

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राष्ट्रीय पर्व 26 जनवरी 2013 को हिन्दी चलवैजन्ती पुरस्कार एवं विशेष रूप से "हिन्दी में उल्लेखनीय कार्य" के लिए बी एच ई एल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री ए. के. दवे द्वारा पुरस्कार प्राप्त करते हुए दाएं से प्रथम स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"

"उम्मीदें क्यों?" विश्व पुस्तक मेला में उपलब्ध

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मेरा पुरस्कृत काव्य संग्रह "उम्मीदें क्यों?" विश्व पुस्तक मेला में उपलब्ध

कवि सम्मेलन में काव्य पाठ

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4 जनवरी 2013 को भेल दिवस पर आयोजित कवि सम्मेलन में काव्य पाठ करते हुए।

ग़ुणता वृत्त का राष्ट्रीय "प्रतिष्ठित पुरस्कार" प्राप्त

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17 से 20 दिसम्बर 2012 को कानपुर में आयोजित गुणता वृत्त के राष्ट्रीय सम्मेलन में "प्रतिष्ठित पुरस्कार" प्राप्त करते हुए बाएं से तीसरे स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"

"हिन्दी साहित्य सेवा" के लिए सम्मानित

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16 दिसम्बर 2012 को झाँसी महोत्सव के ऐतिहासिक कार्यक्रम में "हिन्दी साहित्य सेवा" के लिए श्री गौरव दयाल जिलाधिकारी, झाँसी महानगर द्वारा सम्मानित किया गया।

प्रथम पुरस्कार

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गुणता माह नवम्बर 2012 में ध्येय वाक्य के लिए भेल, झाँसी के कार्यपालक निदेशक श्री ए. के. दवे द्वारा "प्रथम पुरस्कार" प्रदान किया गया।

बुधवार, 30 जनवरी 2013

जींस और टॉप

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हमें
न जाने क्या हो गया
आपस का प्यार खो बैठे
हमें देख
हमारे आधुनिक लज्जा वस्त्रों
जींस और टॉप की भी
आपस में ठन गई
और
जिद्दी टॉप की
जींस से दूरी बढ गयी
और बढी...........
और बढी...........
बढती ही गयी

जींस ने भी
सभ्यता को चिढाकर
दूरी बढाना शुरू कर दी
हद कर दी
आपस का मनमुटाव
मनमानी करने लगा
और
सभ्यता का हनन करके
संस्कृति को रौंदने लगा
जींस ने
नाभि की सरहद पार कर ली
टॉप भी
मनमानी करके आगे बढ चला
बदतमीज
अपने वक्षस्थल की सरहद पार करे
इससे पहले
दोनों में कितना प्यार था
बताना होगा

समा जाते थे एक-दूसरे में
साक्षी है बेल्ट इस बात का
जो
रखता था ध्यान इस बात का
कि
मर्यादा उघारी न हो
इसलिए
खुश होकर लिपट जाता था
दोनों के केंद्र बिंदु कमर से

भारतीय सभ्यता का बलात्कार हो
और
हमारे संस्कार आत्महत्या करें
इससे पहले
विपरीत चल रहे
दोनों बिंदुओं (जींस और टॉप) को
वृत्त की परिधि में लाना होगा
क्योंकि
एक-दूसरे के विपरीत
गतिशील बिंदु
नकारात्मक हों
तो भी
वृत्त में
एक निश्चित स्थान पर
मिल ही जाते हैं।