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सोमवार, 30 जुलाई 2012

वसीयत (पुरस्कृत कविता)

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("हिन्द-युग्म" द्वारा जनवरी 2011 में आयोजित विश्वस्तरीय "यूनिकवि" काव्य प्रतियोगिता में 9 वां स्थान प्राप्त कविता)


जिंदगी भर
पिता ने
कवच बनकर
बेटे को सहेजा
लेकिन
पुत्र कोसता रहा
जन्मदाता पिता को
और
सोचता रहा
जाने कब लिखी जाएगी वसीयत मेरे नाम

पुत्र ने
युवावस्था में जिद की
और
बालहठ को दोहरा कर
फैल गया धुँए सा
पिता ने
गौतम बुद्ध की तरह शांत रहकर
अस्वीकृति व्यक्त की

कुछ देर
शांत रहने के बाद
हाथ से रेत की तरह फिसलते
बेटे को देखकर
पिता बोला
मेरी वसीयत के लिए
अभी तुम्हें करना होगा
अंतहीन इंतजार

कहते हुए
पिता की आँखों में था
भविष्य के प्रति डर
और
पुत्र की आँखों का मर चुका था पानी
भूल गया था वह
पिता द्वारा दिए गए
संस्कारों की श्रृंखला
अब नहीं जानता वह
अच्छे आचार-विचार
व्यवहार और
संस्कारों को मर्यादा में रखना
क्योंकि
यूरिया खाद
और
परमाणु युगों की संतानों का भविष्य
अनिश्चित है

नालायक हो गए हो तुम
भूल गए
तुम्हारे आँसुओं को हर बार
ओक में लिया है
जमीन पर नहीं गिरने दिया
अनमोल समझकर
पिता के भविष्य हो तुम
तुम्हारी वसीयती दृष्टि ने
पिता की सम्भावनाओं को
पंगु बना दिया है

तुमने
मर्यादित दीवार हटाकर
उसे कोष्ठक में बंद कर दिया
तुम्हारी संकरी सोच से
कई-कई रात
आँसुओं से मुँह धोया है उसने

तुम्हारी
वस्त्रहीन इच्छाओं के आगे
लाचार पिता
संख्याओं के बीच घिरे
दशमलव की तरह
घिरा पाता है स्वयं को
और
महसूस करता है
बंद आयताकार में
बिंदु सा अकेला
जहाँ
बंद है रास्ता निकास का

चेहरे के भाव से
देखी जा सकती है उसके अंदर
मीलों लम्बी उदासी
और
आँखों में धुंधुलापन
तुम्हारी हर अपेक्षा
उसके गले में कफ सी अटक चुकी है

तुम
पिता के लिए
एक हसीन सपना थे
जिसकी उंगली पकड़कर
जिंदगी के पार जाना चाहता था वह
तुम्हारी
असमय ढे‌रों इच्छाओं से
छलनी हो चुका है वह
और
रिस रहा है
नल के नीचे रखी
छेद वाली बाल्टी की तरह

आज तुम
बहुत खुश हो
मैं समझ गया
तुम्हारी इच्छाओं की बेडि‌यों से जकड़ा
पिता हार गया तुमसे
और
लिख दी वसीयत तुम्हारे नाम
अब तुम
निश्चिंत होकर
देख सकते हो बेहिसाब सपने।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

अम्मा और बाबूजी

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घर की ढेरों चीजें
जो व्यवस्थित रखी हैं
अपने-अपने स्थान पर
फिर भी
हम भूल जाते हैं
रखकर उन्हें
केवल दो ही लोग निभाते हैं
इस जिम्मेदारी को
अम्मा और बाबूजी
जो
आज हमारे साथ हैं

समय बीतते
साथ छोड़ दिया दोनों ने
अब हम
चीजों की जगह
अम्मा और बाबूजी को भूलने लगे हैं।

नदी की आत्महत्या

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नदी दुःखी है
सागर में समाने के बाद
बुरी तरह
फंस चुकी है
समुद्र के जाल में
खो चुकी है
स्वयं का अस्तित्व
खत्म हो चुके हैं
उसके किनारे
और
हलचल
समुद्र की हिलोरों में
कर चुकी है वह समर्पण

नदी को चलना ही होगा
समुद्र के प्रवाह के साथ
क्योंकि
एक पूरी नदी
खाली हो चुकी है समुद्र में
और
पूरी तरह
समुद्र थोप चुका है
नदी पर अपनी इच्छाएं
और अब
नदी को भी हो चुका है
समुद्र में समाने की
अपनी गलती का अहसास

नदी का
समुद्र में समाना तो
एक सदियों पुरानी परंपरा है

नदी को
स्त्री के रूप में
समुद्र के आगे
झुकना ही होगा
सशर्त समझौता होता
तो भी ठीक था
लेकिन
शर्त कोई नहीं
बस
कट्टरपंथी समुद्र के आगे
केवल और केवल
समझौता ही करना है
समझ नहीं आता
नदी का समुद्र में समाना
एक हादसा था
या
नदी की आत्महत्या
फिर भी
मुझे लगता है
समुद्र में समाने के बाद
नदी को महसूस नहीं किया जा सकता
न ही
सुनी जा सकती हैं उसकी सिसकियाँ
इसलिए
यह आत्महत्या ही है। 

सच

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(हिन्द-युग्म द्वारा दिसम्बर 2010 में आयोजित विश्वस्तरीय यूनिकवि काव्य प्रतियोगिता में 11 वां स्थान प्राप्त कविता)


तुम्हें
सच को स्वीकारना ही होगा
किसी के प्रति
आँख फेरकर
तुम
क्या साबित करना चाहते हो ?

सच का केंद्रीयकरण
अकारण
उछाल नहीं लेता
हर बार
हिले होंठ अर्थहीन हों
जरूरी नहीं
सच
अल्पसंख्यक हो सकता है पर
हरिजन नहीं
सच
वाचाल तो हो सकता है पर
मूक नहीं
हठी भी हो सकता है पर
झूठ की तरह अडि‌यल नहीं
सच
सूक्ष्म हो सकता है पर
झूठ के फेन सा
विस्तार नहीं ले सकता

सच
केवल दृष्टि पर विश्वास नहीं करता
तुम्हारे धर्म और जाति से भी
उसे कोई मतलब नहीं
तुम्हारी निर्धनता से
क्या लेना-देना उसे
तुम्हारी आशिक मिजाजी भी
पसंद नहीं करता वह
वो तो
आकर्षण की परिभाषा भी नहीं जानता
इन सबसे हटकर
सच केवल
राजा हरीश्चंद्र और
धर्मराज युधिष्ठर का अनुयायी है

सच
गुलामी नहीं करता झूठ की
क्योंकि
जानता है वह
यदि झूठ का विस्तार होगा तो
बहस होगी
बहस होगी तो
दूरियाँ बढे‌गी
दूरियाँ बढे‌गी तो
संधि-विच्छेद होगा
इसलिए
सच की मौलिकता सच ही है
सच रामायण सा सरल है
सच संस्कारी भी है
चंद्रशेखर आजाद से
आजाद सच को
कभी कैनवास पर उतारो तो जानें

वैभवशाली सच
कभी मुरझा नहीं सकता
यातना से मोड़ लोगे झूठ को अपनी ओर
लेकिन
सद्दाम हुसैन सा जिद्दी सच
झुक नहीं सकता
सच एकदम नंगा होता है
इसलिए
आदमी को भी नंगा करता है
कहते हैं
नंगों से तो
खुदा भी डरता है
कितना भी बुरा हो सच
पर खूनी नहीं हो सकता

कोई तो समर्थक होगा
सच का
तभी तो
इतिहास के सच की
आन-बान और शान वाली गाथाएँ
उकेरी हुई हैं आज भी भित्ति चित्रों में

सच
प्रेयसी का आलिंगन है
सच
तरूणी की अँगड़ाई है
सच तो सच है
आखिर
कितना दबाओगे सच को
शीत सा उभर ही आएगा
सच केवल वर्तमान ही नहीं
भूतकाल और भविष्यकाल में भी विजयी है
सच
झूठ की तरह दोहराया नहीं जाता
बस एक बार ही
सच कहा जाता है
और
निर्णय हो जाता है
झूठ को मिटाने के लिए
तमाम एन्टी वायरस प्रयोग किए जाते हैं
लेकिन
सच
वायरस रहित है

अनगिनत अंकों वाली
संख्याओं से घिरा दशमलव
सच ही तो है
क्योंकि
बढ‌ती जाती हैं
संख्या दर संख्या
फिर भी
अडिग है अपने स्थान पर
दशमलव वाला सच
और
कितने सच जानोगे
तब मानोगे सच को
अच्छा हो यदि
अपनी सोच को बदलो तुम
और
सच को
जेब में डालकर घूमने की जगह
अपने संस्कारों के साथ
मस्तिष्क में
करीने से सजाकर रखो
और
सच
केवल सच कहो।  

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

तुम कब आओगे पता नहीं

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तुम
कब आओगे
पता नहीं
साठ डिग्री तक
पैरों को मोड़कर
और
पीठ का
कर्व बनाकर
दोनों घुटनों के बीच
सिर रखकर
एक लक्ष्य दिशा की ओर
खुले हुए स्थिर पलकों से
बाट जोहती हूँ तुम्हारी
तुम
कब आओगे
पता नहीं

दोनों पलकों के बीच
तुम्हारे इंतजार का
हाइड्रोलिक प्रेशर वाला जेक
पलक झपकने नहीं देता

दूर दृष्टि का
माइनस फाइव वाला
मोटा चश्मा चढ़ा होने पर भी
बिना चश्मे के ही
दूर तक
देख सकती हूँ मैं तुमको
लेकिन
तुम
कब आओगे
पता नहीं

एकदम सीधी
और
शांत होकर चलने वाली
डी सी करण्ट की तरह
ह्रदय की धड‌कन का प्रवाह
तुम्हारे आने की संभावना से
ऊबड़-खाबड़
ए सी करण्ट में बदलकर
ह्रदय की गति को
अनियंत्रित कर देता है
लेकिन
जब संभावना भी खत्म हो जाती है
तब लगता है
ज्यामिति में
अनेक कोण होते हैं
इसलिए
क्यों न लम्बवत् होकर
एक सौ अस्सी डिग्री का कोण बनाऊं
और
थक चुकी आंखों को
बंद करके सो जाऊं
क्योंकि
तुम
कब आओगे
पता नहीं।