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गुरुवार, 18 मार्च 2010

मुख्य अतिथि का आगमन

इस वर्ष ग्रीष्म ऋतु में हमारे यहाँ मुख्य अतिथि का आगमन हुआ। मुख्य अतिथि अर्थात परम आदरणीय साला जी और साली जी। परम आदरणीय इसलिए कि यदि आप साला और साली का आदर नहीं करेंगे तो अपनी एक मात्र पत्नी के कोप भाजन का शिकार हो सकते हैं।
मेरी भाग्यविधाता श्रीमतीजी के विशेष आग्रह पर साला और साली बच्चों सहित बुखार की भांति, बिना पूर्व सूचना के हमारे किराए के छोटे से मकान में, मकान मालिक की शर्तों में से एक कि ग्रीष्म ऋतु में पानी के अभाव के कारण अतिथि का आना सख्त मना है का उल्लघंन करते हुए भारी मात्रा में हमारे यहाँ पधारे। उन्हें देखते ही पत्नी सूरजमुखी के फूल की भांति खिली और हमने साली को देखकर क्लोजअप टूथपेस्ट के विज्ञापन की सी मुस्कान बिखेरी। साले की तरफ तो हमने ध्यान ही नहीं दिया क्योंकि हमें एक कहावत चरितार्थ होने का डर लगता है कि घर को बिगाड़ा आलों ने और जीजा को बिगाड़ा सालों ने। इसलिए आज तक हम साले को बुखार में तली चीजों से परहेज की भांति त्यागते रहे।
घर में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम बच्चों की हिटलरी सेना ने छीना झपटी में टी० वी० का रिमोट तोड़ा तो मैंने टॉफी का लालच देकर उन्हें बगीचे में खेलने को कहा। दस मिनिट बाद ही मकान मालिक ने अतिथि आगमन का विरोध करके, बगीचे का आँखों देखा हाल सुनाया तो विश्वास ही नहीं हुआ। जाकर देखा तो बगीचा अशोक वाटिका की तरह उजड़ चुका था। मकान मालिक ने हमारे ऊपर वीटो लगाते हुए कहा कि यदि कुछ और क्षति हुई तो मकान खाली करना पड़ेगा। हमने जैसे-तैसे उनसे शांति समझौता किया और अन्दर पहुँचे तो देखा कि हमारे दो कमरे के मकान पर पूरी तरह से गृहमंत्रालय अर्थात ससुराल पक्ष का अवैध रूप से कब्जा हो चुका है। इधर का सामान उधर, उधर का सामान इधर। पता ही नहीं चला कौन सा ड्रांइग रूम है और कौन सा बेडरूम। सभी अपने में मगन हो गए और मेरी ओर से पुराना अखबार समझकर मुँह फेर लिया। दिन तो जैसे-तैसे बीत गया किन्तु रात बैडरूम में अवैध कब्जा होने के कारण माता का एक दिवसीय जागरण समझकर बरामदे में ही काटी।
सुबह होते ही स्नानगृह की बुकिंग चालू। जब मेरा नम्बर आया तो नल जा चुका था। स्नानगृह के सभी बर्तन खाली थे। डूबने लायक चुल्लु भर पानी भी नहीं बचा था। जैसे-तैसे कड़कड़ाती सर्दी में, फ्रिज की ठंडी बोतल से मुँह धोकर काम चलाया। दिन बीतते रहे और हम प्रतिदिन श्रीमतीजी की दृष्टि में शेयर के भाव की तरह गिरते रहे। इस व्यवहार से हमें अतिथि देवो भव की कहावत पर निराशा हुई और मैं स्वयं को ही कोसने लगा। मुख्य अतिथि के आगमन को पूरा एक सप्ताह हो चुका था। नित नए व्यंजनों ने महीने का राशन एक सप्ताह में ही खर्च करके, पाकिस्तान की तरह मेरी आर्थिक व्यवस्था डगमगा दी। मैंने श्रीमतीजी के समक्ष जब इस बात पर चिन्ता व्यक्त की तो जिस प्रकार से 31 दिसम्बर आने पर वार्षिक केलेन्डर से मोहभंग हो जाता है, उसी प्रकार मेरे साथ भी 31 दिसम्बर का सा व्यवहार होने लगा।
नौकर भी मालिक के घर में पराया नहीं कहलाता और में अपने ही घर में प्रवासी हो गया। मुझे अपना अस्तित्व विलुप्त सा लगने लगा। कारण श्रीमतीजी द्वारा ससुराल पक्ष का पूरा ध्यान और अपेक्षा, मेरी ओर से अंतर्ध्यान और उपेक्षा। साली किसे प्रिय नहीं होती है, किन्तु मेरे साथ होने वाले सौतेलेपन ने मेरे मन में साली के प्रति ईर्ष्या का भाव भर दिया। ससुराल पक्ष मुझे गोखुरू का तीन मुँह सा कांटा लगने लगा। क्योंकि ससुराल वाले, अखबार के मुखपृष्ठ की हेडलाइन जिसे सब पढ़ते हैं और मैं अखबार के किसी कोने में छपा शोक समाचार हो गया। जिसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता।
मुख्य अतिथियों का अवैध कब्जा हुए आज नौ दिन और नौ रात हो चुकी हैं। मैं ही जानता हूँ कि किस प्रकार नौ रातें नव दुर्गा उत्सव में माता का जागरण समझकर काटी हैं। इसलिए मैंने उपेक्षा से ग्रस्त होकर दसवें दिन पत्नी से संबंध विच्छेद का कठोर निर्णय ले लिया। लेकिन अनहोनी को शायद साली ने भांप लिया और बोली अच्छा जीजाजी अब चलते हैं। हमने बहुत सोच.समझकर डरते-डरते कहा जैसी आपकी इच्छा।
मुख्य अतिथियों के जाते ही श्रीमतीजी पुनः हमारे ऊपर धारा तेल की तरह प्यार उडेलने लगीं। कहावत है कि साल में एक बार घूरे के दिन भी फिरते हैं। उसी तरह मेरे दिन भी फिरे और मैं अपनी श्रीमतीजी के लिए एक बार फिर से अखबार के मुख्यपृष्ठ की हेडलाइन हो गया और संबंध विच्छेद होने से बच गया।



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