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मंगलवार, 21 अगस्त 2012

अम्मा-बाबूजी


घर की ढेरों चीजें
जो व्यवस्थित रखी हैं
अपने-अपने स्थान पर
फिर भी
हम भूल जाते हैं
रखकर उन्हें
दो ही लोग निभाते हैं केवल
इस जिम्मेदारी को
अम्मा और बाबूजी
जो
आज हमारे साथ हैं
समय बीतते
साथ छोड़ दिया दोनों ने
अब हम
चीजों की जगह
अम्मा और बाबूजी को भूलने लगे हैं
घर की चीजें
जो यहां-वहां पडी‌ हैं
उन्हें संभालना अब
हमारी जिम्मेदारी है
बंटवारे में
हमारे हिस्से में मिली चीजों को
संभालकर रखने में निकल जाता है आधा दिन
अब वह
सबकी नहीं बल्कि
केवल हमारी सम्पत्ति का हिस्सा हैं।

3 टिप्पणियाँ:

Raghunath Misra ने कहा…

वाह क्या बात है.

Raghunath Misra ने कहा…

lagaatar aage-age badhte jaane ki oar agrasar dekh anandabhuti hoti hai.apnon ki badhat urjaa pradan karti hai.hardik badhai aur anant shubh kaamnayen.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सच्चाई को कहती सुंदर अभिव्यक्ति

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