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शुक्रवार, 2 मार्च 2018

वह औरत है

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उम्र को अंगूठा दिखाकर
दिनभर की भागम-भाग के बाद
घर लौटती है जब मजूरन
भूल जाती है
दिनभर की अपनी व्यस्तता
फिर
थकान को खूंटी पर टांगकर ...
एक-एक करके
चूल्हे में सरकाती है लकड़ियाँ और
लकड़ियों के साथ खुद जलकर
सबकी खुशी का रखती है ध्यान
क्योंकि
वह औरत है।  




गुरुवार, 21 सितंबर 2017

वोट डालने क्यों गए

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हे लोकतंत्र के दगाबाज
काले कारनामों के सरताज
हिंदु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई
काहे के भाई
बताओ
यह कहकर तुमने धार्मिक आग क्यों लगाई?
तुम
घोटाले और भ्रष्टाचार के आरोप में
जेल में बंद रहकर भी
बिना प्रचार के
चुनाव जीत गए
दुःख होता है
हम वोट डालने ही क्यों गए॥1॥

अवैध संतानों के जन्मदाता
खुद को कहते हो भारत भाग्य विधाता
फिर
नारायणदत्त तिवारी वाली हरकत करते
तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आयी
तुम्हारी लपलपाती जीभ देखकर
वह मजूरन
आज तक अपना आँचल नहीं ढक पायी
तुमने उसकी आबरू भी लूटी और
वोट मांगने भी गए
दुःख होता है
हम वोट डालने ही क्यों गए॥2॥

हे कामदेव के ईष्ट समर्थकों
आशाराम बापू और राम-रहीम के अनुयायी
बहू-बेटियों की इज्जत भी अब
तुमसे कहाँ सुरक्षित रह पायी
अपराध तुम करो 
धारा हम पर लगे
तुम पर
काहे की धारा काहे की रोक
तुम चाहे जिसका गाल छुओ तो कोई बात नहीं
हमने टमाटर छुये तो अपराधी हो गए
दुःख होता है
हम वोट डालने ही क्यों गए॥3॥

नगरपालिका की पानी की टंकी पर लगे
मधुमक्खी के छत्तों
बरसाती कुकुरमुत्तों
तुमने
फकीरी में जन्म लिया
जवानी गरीबी में बीती और
नेता बनते ही अमीर हो गए
इसलिए
तुम्हारी वसीयत के हकदार
केवल दो बच्चे ही लिखे गए
और जिन दर्जनों बच्चों की शक्ल तुमसे मिलती है
उनका क्या?
उन्हें तुम कैसे भूल गए
दुःख होता है
हम वोट डालने ही क्यों गए॥4॥

अर्थी के लिए बजते बाजों
शोकधुन पर थिरकने वाले धोखेबाजों
सत्ता पाकर हुए घमंडी
महाभारत के चालबाज शिखंडी
शहर में जब भी दंगा हुआ है
मजहब के नाम पर आदमी नंगा हुआ है
इसलिए
तुम्हारे एक इशारे पर कुछ लोग
गौ मांस का टुकड़ा मंदिर में फेंक गए
और कुछ लोग मस्जिद के बाहर
‘ॐ नमः शिवाय’ लिखकर भाग गए
साम्प्रदायिक दंगों में हजार मरे
सरकारी आँकड़ों में सौ लिखे गए
वोट की खातिर तुम कितना गिर गए?
दुःख होता है
हम वोट डालने ही क्यों गए॥5॥

मौत का फरमान लिखे काले अक्षर
बंजर भूमि में शिलान्यास के पत्थर
जिन इमारतों का तुमने 
किया था शिलान्यास
दबकर उनमें 
सैकड़ों मजदूर मर गए
न कथनी अच्छी है तुम्हारी 
न करनी अच्छी है
फिर तुम 
उदघाटन करने ही क्यों गए
तुम्हारे दुष्कर्म देखकर
माँ-बाप भी सोचते होंगे
तुम 
पैदा होते ही क्यों नहीं मर गए
दुःख होता है
हम वोट डालने ही क्यों गए॥6॥


बुधवार, 26 अप्रैल 2017

पवित्र रिश्ता

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माँ अंकित से शादी करके बहू घर लाने की बात कह-कहकर थक गयी थी। वो चाहती थी कि उसके स्वर्ग सिधारने से पहले बहू घर पर आ जाये जिससे उसके बाद वह अंकित का ध्यान रख सके। धीरे-धीरे समय बीतता रहा और माँ बूढ़ी होती गयी।
             एक दिन अंकित दुकान पर पहुँचकर अगरबत्ती भी नहीं लगा पाया था कि एक सुंदर सी युवती आयी और बोली एक पैकेट मैगी दे दीजिए। अंकित उसकी सुंदरता देखकर आश्चर्यचकित हुआ और बिना पलक झपके उसे ही देखता रहा। कुछ देर बाद जेब में रखे मोबाइल की घंटी ने उसे सचेत किया तो उसने मैगी का पैकेट युवती को देते हुये कहा यह लीजिए और बोनी का टाइम है छुट्टे पैसे देना। युवती ने हाँ में सिर हिलाते हुये पर्स टटोला तो वह खाली था। शर्मिंदा होते हुये वह बोली माफ कीजिए मैं भूल से दूसरा पर्स ले आयी मैगी वापिस रखिये मैं अभी पैसे लेकर आती हूँ कहकर वह पैसे लेने चली गयी।

अबतक शादी की मना करते-करते अंकित उस युवती को दिल दे बैठा और मन ही मन सोचने लगा कि उसके पुनः आते ही उससे अपने साथ शादी के रिश्ते का प्रस्ताव रख दूंगा। कुछ ही देर बाद युवती वपिस आयी और अंकित ने उसे मैगी का पैकेट देते हुये अपनी बात कहना चाहा तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ आया और उस युवती का हाथ पकड़कर बोला कि मम्मी मुझे टॉफी खाना है। “मम्मी” शब्द सुनकर अंकित को झटका तो लगा लेकिन तुरंत ही उसने अपने आपको सम्भाला और युवती के विवाहित होने की जानकारी के अभाव में उससे शादी का मन में जो विचार आया था उसके लिये क्षमा मांगी और दुकान में रखी हुयी राखी उठाकर उसकी ओर बढ़ाते हुये कहा बहिनजी मुझे राखी बांधकर एक नये और पवित्र रिश्ते की शुरूआत करो।

युवती अंकित के विचार जानकर बहुत प्रभावित हुयी और उसने तुरंत ही उसे राखी बांधते हुये कहा आज मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मेरा भी एक भाई है। राखी बांधने के बाद दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था वे छलछलाती आँखों से एक-दूसरे को इस तरह देखने लगे जैसे वर्षों बाद बिछुड़े हुये भाई-बहिन मिले हों।