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रविवार, 31 अक्टूबर 2010

कवि का दुःख (पुरस्कृत कविता)

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(“हिन्द-युग्म” द्वारा जुलाई 2010 में आयोजित विश्वस्तरीय “यूनिकवि” काव्य प्रतियोगिता में आठवां स्थान प्राप्त पुरस्कृत कविता)


अगर
भूल जाऊँ कविता लिखना
तो
शीत की तरह
उभर आएँगे
स्मृति पटल पर
तमाम दुःख
शोक और
मानवीय संवेदनाओं के
मिले‌‌-जुले भाव
और
तब
हवा के थपेड़ों से पिटती हुई
अनिश्चित गंतव्य की ओर
चलती हुई नाव
और
उसमें प्रथम बार यात्रा कर रहे
सहमे हुए यात्री की आँखों से
निकल आएँगे अश्रु
और
पेट में उठेगा
ज्वार-भाटे सा दर्द
माथे पर होंगे
मिश्रित भाव
तब
शर्म से
समा जाएगी धरती
आकाश में या
पुनः स्मरण हो आएगी
कवि को कविता।

बुधवार, 12 मई 2010

सुखद हवा का झोंका

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पिता की लाचारी
माँ की बीमारी
लकवाग्रस्त छोटी बहिन प्यारी
बेरोजगार बैठा छोटा भाई
और
घर की ढेरों जिम्मेदारी
ढेरों मानसिक तनाव
ऐसे में भी
मेरी ओर तुम्हारा (पत्नी का) झुकाव
तूफानी आंधी में
सुखद हवा का झोंका है।

मेरी इच्छा

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क्या कहा तुमने
मैंने
अपनी इच्छाओं को रोका है
मैंने
अपनी इच्छाओं को मारा है
अपने लिए कुछ भी नहीं सोचा
गलत हो तुम
और
तुम्हारी यह सोच
क्योंकि
मेरी इच्छाएं हैं
अपनी दैनिक मजदूरी में से
किसी तरह
बाबूजी का चश्मा बनवाऊं
माँ की पैबन्द वाली साड़ी बदलवाऊं
छोटे भाई को सहारा दूं
और
बहिन के हाथ पीले करके
असहाय माँ-बाप की जिम्मेदारी निभाऊं।

सदियों तक

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मैं चाहता हूं
कि
तुम इस घर में
तुलसी के घरवे पर
दीपक सी जलती रहो
क्योंकि
यहां लोग
जन्मते रहेंगे
मरते रहेंगे
लेकिन
तुलसी के घरवे पर
दीपक जलाने का क्रम
सदियों तक जारी रहेगा
मैं तुम्हें
सदियों तक देखना चाहता हूं।

बहेलिए से निवेदन

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बहेलिए
बंद पिंजरे में
पक्षियों की घुटन
तुम
क्या समझो
तुम्हे भी तो
बंद कमरों से बाहर
खुली हवा
अच्छी लगती है
इसलिए
पिंजरे का आकार
बढ़ाने की मत सोचो
पक्षियों को कर दो मुक्त
और
उड़ने दो उन्मुक्त
खुले गगन में।

सोमवार, 22 मार्च 2010

कवि की उम्र

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एक कवि
कभी नहीं मरता
उसके लिए
शताब्दियां
नाम मात्र की भी नहीं हैं
क्योंकि
कवि की उम्र
उसकी कविताएं हैं
और
कविताओं की
कोई उम्र नहीं होती।

आत्मकथा

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खबर
बड़ी चर्चित है
कि
शहर के प्रसिद्ध समाजसेवी ने
आत्महत्या कर ली
हिम्मतदार पुलिसवाला
ट्रेन से कटकर मर गया
और
ह्रदय गति रूकने से
नेताजी का देहान्त हो गया
कारण
एक वेश्या ने
अपनी आत्मकथा को
अखबार में छपवा दिया।