26 जनवरी 2009 को भेल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री आर के पाण्डेय जी द्वारा गुणता वृत्त सम्मेलन में अपनी प्रस्तुति के लिए द्वितीय स्थान प्राप्त करने पर समूह के साथ पुरस्कार प्राप्त करते हुए बाएं से तीसरे स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"।मंगलवार, 23 नवंबर 2010
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मंगलवार, नवंबर 23, 2010
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26 जनवरी 2009 को भेल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री आर के पाण्डेय जी द्वारा गुणता वृत्त सम्मेलन में अपनी प्रस्तुति के लिए द्वितीय स्थान प्राप्त करने पर समूह के साथ पुरस्कार प्राप्त करते हुए बाएं से तीसरे स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"।पुस्तक विमोचन
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कवि सुधीर गुप्ता “चक्र” की हास्य व्यंग्य कविताओं की पुस्तक “अरे! हम तो फिसल गए” का विमोचन एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में आदरणीय बाल कवि बैरागी जी एवं भेल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री आर के पाण्डेय जी द्वारा किया गया। कवि सम्मेलन में कवि डॉ सुनील जोगी, व्यंजना शुक्ला, राजेंद्र राजन आदि कवि उपस्थित थे। चित्र में बायीं ओर काली जैकेट और कत्थई शर्ट पहने हुए कवि सुधीर गुप्ता “चक्र”।
ध्यान दें
यह विश्व की ऐसी पहली पुस्तक है जिसे पढने से पहले शुरु में ही व्यंग्यात्मक "चेतावनी" दी गई है। अतः चेतावनी ध्यान से पढकर ही पुस्तक पढें अन्यथा कवि की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।
रविवार, 31 अक्टूबर 2010
कवि का दुःख (पुरस्कृत कविता)
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(“हिन्द-युग्म” द्वारा जुलाई 2010 में आयोजित विश्वस्तरीय “यूनिकवि” काव्य
प्रतियोगिता में आठवां स्थान प्राप्त पुरस्कृत कविता)
अगर
भूल जाऊँ कविता लिखना
तो
शीत की तरह
उभर आएँगे
स्मृति पटल पर
तमाम दुःख
शोक और
मानवीय संवेदनाओं के
मिले-जुले भाव
और
तब
हवा के थपेड़ों से पिटती हुई
अनिश्चित गंतव्य की ओर
चलती हुई नाव
और
उसमें प्रथम बार यात्रा कर रहे
सहमे हुए यात्री की आँखों से
निकल आएँगे अश्रु
और
पेट में उठेगा
ज्वार-भाटे सा दर्द
माथे पर होंगे
मिश्रित भाव
तब
शर्म से
समा जाएगी धरती
आकाश में या
पुनः स्मरण हो आएगी
कवि को कविता।
अगर
भूल जाऊँ कविता लिखना
तो
शीत की तरह
उभर आएँगे
स्मृति पटल पर
तमाम दुःख
शोक और
मानवीय संवेदनाओं के
मिले-जुले भाव
और
तब
हवा के थपेड़ों से पिटती हुई
अनिश्चित गंतव्य की ओर
चलती हुई नाव
और
उसमें प्रथम बार यात्रा कर रहे
सहमे हुए यात्री की आँखों से
निकल आएँगे अश्रु
और
पेट में उठेगा
ज्वार-भाटे सा दर्द
माथे पर होंगे
मिश्रित भाव
तब
शर्म से
समा जाएगी धरती
आकाश में या
पुनः स्मरण हो आएगी
कवि को कविता।
बुधवार, 12 मई 2010
सुखद हवा का झोंका
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पिता की लाचारी
माँ की बीमारी
लकवाग्रस्त छोटी बहिन प्यारी
बेरोजगार बैठा छोटा भाई
और
घर की ढेरों जिम्मेदारी
ढेरों मानसिक तनाव
ऐसे में भी
मेरी ओर तुम्हारा (पत्नी का) झुकाव
तूफानी आंधी में
सुखद हवा का झोंका है।
माँ की बीमारी
लकवाग्रस्त छोटी बहिन प्यारी
बेरोजगार बैठा छोटा भाई
और
घर की ढेरों जिम्मेदारी
ढेरों मानसिक तनाव
ऐसे में भी
मेरी ओर तुम्हारा (पत्नी का) झुकाव
तूफानी आंधी में
सुखद हवा का झोंका है।
मेरी इच्छा
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क्या कहा तुमने
मैंने
अपनी इच्छाओं को रोका है
मैंने
अपनी इच्छाओं को मारा है
अपने लिए कुछ भी नहीं सोचा
गलत हो तुम
और
तुम्हारी यह सोच
क्योंकि
मेरी इच्छाएं हैं
अपनी दैनिक मजदूरी में से
किसी तरह
बाबूजी का चश्मा बनवाऊं
माँ की पैबन्द वाली साड़ी बदलवाऊं
छोटे भाई को सहारा दूं
और
बहिन के हाथ पीले करके
असहाय माँ-बाप की जिम्मेदारी निभाऊं।
मैंने
अपनी इच्छाओं को रोका है
मैंने
अपनी इच्छाओं को मारा है
अपने लिए कुछ भी नहीं सोचा
गलत हो तुम
और
तुम्हारी यह सोच
क्योंकि
मेरी इच्छाएं हैं
अपनी दैनिक मजदूरी में से
किसी तरह
बाबूजी का चश्मा बनवाऊं
माँ की पैबन्द वाली साड़ी बदलवाऊं
छोटे भाई को सहारा दूं
और
बहिन के हाथ पीले करके
असहाय माँ-बाप की जिम्मेदारी निभाऊं।
सदियों तक
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मैं चाहता हूं
कि
तुम इस घर में
तुलसी के घरवे पर
दीपक सी जलती रहो
क्योंकि
यहां लोग
जन्मते रहेंगे
मरते रहेंगे
लेकिन
तुलसी के घरवे पर
दीपक जलाने का क्रम
सदियों तक जारी रहेगा
मैं तुम्हें
सदियों तक देखना चाहता हूं।
कि
तुम इस घर में
तुलसी के घरवे पर
दीपक सी जलती रहो
क्योंकि
यहां लोग
जन्मते रहेंगे
मरते रहेंगे
लेकिन
तुलसी के घरवे पर
दीपक जलाने का क्रम
सदियों तक जारी रहेगा
मैं तुम्हें
सदियों तक देखना चाहता हूं।
बहेलिए से निवेदन
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बहेलिए
बंद पिंजरे में
पक्षियों की घुटन
तुम
क्या समझो
तुम्हे भी तो
बंद कमरों से बाहर
खुली हवा
अच्छी लगती है
इसलिए
पिंजरे का आकार
बढ़ाने की मत सोचो
पक्षियों को कर दो मुक्त
और
उड़ने दो उन्मुक्त
खुले गगन में।
बंद पिंजरे में
पक्षियों की घुटन
तुम
क्या समझो
तुम्हे भी तो
बंद कमरों से बाहर
खुली हवा
अच्छी लगती है
इसलिए
पिंजरे का आकार
बढ़ाने की मत सोचो
पक्षियों को कर दो मुक्त
और
उड़ने दो उन्मुक्त
खुले गगन में।
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