ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। मेरे समर्थक (Follower) बनकर मुझसे जुड़ें। मेरी पुस्तकें ऑनलाइन खरीदें अथवा संपर्क करें। WhatsApp: 9451169407 | 8953165089 | इस ब्लॉग की समस्त रचनाओं के © सर्वाधिकार सुधीर गुप्ता ‘चक्र’ के पास सुरक्षित हैं।

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

उम्मीदें क्यों? (काव्य संग्रह)

2 टिप्पणियाँ
कवि सुधीर गुप्ता "चक्र" के दूसरे काव्य संग्रह "उम्मीदें क्यों"? पर सुप्रसिद्ध कवि डॉ कुँअर बैचेन जी की
“टिप्पणी”
संक्षेप में कहा जाए तो सुधीर गुप्ता "चक्र" की कविताएँ कृष्ण-कन्हैया के उस सुदर्शन चक्र की भाँति हैं जो सभी विसंगतियों का तब तक पीछा करता है, जब तक वे विसंगतियाँ पराजित नहीं हो जातीं, जब तक उनका शीश धड़ से अलग नहीं हो जाता। "सुधीर" की कविताएँ "सुधार" की कविताएँ हैं।

गोल्ड अवार्ड प्राप्त

0 टिप्पणियाँ
QCFI कानपुर द्वारा 13 नवम्बर 2010 को गुणता वृत्त “गैलेक्सी” के उपनेता के रूप में अपनी सुंदर प्रस्तुति के लिए “गोल्ड अवार्ड” प्राप्त किया। अपने समूह के साथ बाएं से दूसरे स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता “चक्र”।

अन्य गतिविधियाँ

0 टिप्पणियाँ
26 जनवरी 2009 को भेल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री आर के पाण्डेय जी द्वारा गुणता वृत्त सम्मेलन में अपनी प्रस्तुति के लिए द्वितीय स्थान प्राप्त करने पर समूह के साथ पुरस्कार प्राप्त करते हुए बाएं से तीसरे स्थान पर कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"।



पुस्तक विमोचन

0 टिप्पणियाँ
“अरे! हम तो फिसल गए”
कवि सुधीर गुप्ता “चक्र” की हास्य व्यंग्य कविताओं की पुस्तक “अरे! हम तो फिसल गए” का विमोचन एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में आदरणीय बाल कवि बैरागी जी एवं भेल के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री आर के पाण्डेय जी द्वारा किया गया। कवि सम्मेलन में कवि डॉ सुनील जोगी, व्यंजना शुक्ला, राजेंद्र राजन आदि कवि उपस्थित थे। चित्र में बायीं ओर काली जैकेट और कत्थई शर्ट पहने हुए कवि सुधीर गुप्ता “चक्र”।
ध्यान दें
यह विश्व की ऐसी पहली पुस्तक है जिसे पढने से पहले शुरु में ही व्यंग्यात्मक "चेतावनी" दी गई है। अतः चेतावनी ध्यान से पढकर ही पुस्तक पढें अन्यथा कवि की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

कवि का दुःख (पुरस्कृत कविता)

0 टिप्पणियाँ
(“हिन्द-युग्म” द्वारा जुलाई 2010 में आयोजित विश्वस्तरीय “यूनिकवि” काव्य प्रतियोगिता में आठवां स्थान प्राप्त पुरस्कृत कविता)


अगर
भूल जाऊँ कविता लिखना
तो
शीत की तरह
उभर आएँगे
स्मृति पटल पर
तमाम दुःख
शोक और
मानवीय संवेदनाओं के
मिले‌‌-जुले भाव
और
तब
हवा के थपेड़ों से पिटती हुई
अनिश्चित गंतव्य की ओर
चलती हुई नाव
और
उसमें प्रथम बार यात्रा कर रहे
सहमे हुए यात्री की आँखों से
निकल आएँगे अश्रु
और
पेट में उठेगा
ज्वार-भाटे सा दर्द
माथे पर होंगे
मिश्रित भाव
तब
शर्म से
समा जाएगी धरती
आकाश में या
पुनः स्मरण हो आएगी
कवि को कविता।

बुधवार, 12 मई 2010

सुखद हवा का झोंका

1 टिप्पणियाँ
पिता की लाचारी
माँ की बीमारी
लकवाग्रस्त छोटी बहिन प्यारी
बेरोजगार बैठा छोटा भाई
और
घर की ढेरों जिम्मेदारी
ढेरों मानसिक तनाव
ऐसे में भी
मेरी ओर तुम्हारा (पत्नी का) झुकाव
तूफानी आंधी में
सुखद हवा का झोंका है।

मेरी इच्छा

0 टिप्पणियाँ
क्या कहा तुमने
मैंने
अपनी इच्छाओं को रोका है
मैंने
अपनी इच्छाओं को मारा है
अपने लिए कुछ भी नहीं सोचा
गलत हो तुम
और
तुम्हारी यह सोच
क्योंकि
मेरी इच्छाएं हैं
अपनी दैनिक मजदूरी में से
किसी तरह
बाबूजी का चश्मा बनवाऊं
माँ की पैबन्द वाली साड़ी बदलवाऊं
छोटे भाई को सहारा दूं
और
बहिन के हाथ पीले करके
असहाय माँ-बाप की जिम्मेदारी निभाऊं।