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शनिवार, 8 सितंबर 2012

"कलम कलाधर सम्मान"

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2 सितम्बर 2012 को ग्वालियर में आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय साहित्य कुम्भ में देशभर से आये लगभग 400 साहित्यकारों की उपस्थिति में मेरी पुस्तक “उम्मीदें क्यों?” को “कलम कलाधर सम्मान” से विशेष पुरस्कृत कर अलंकृत किया गया है।


मंगलवार, 21 अगस्त 2012

अम्मा-बाबूजी

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घर की ढेरों चीजें
जो व्यवस्थित रखी हैं
अपने-अपने स्थान पर
फिर भी
हम भूल जाते हैं
रखकर उन्हें
दो ही लोग निभाते हैं केवल
इस जिम्मेदारी को
अम्मा और बाबूजी
जो
आज हमारे साथ हैं
समय बीतते
साथ छोड़ दिया दोनों ने
अब हम
चीजों की जगह
अम्मा और बाबूजी को भूलने लगे हैं
घर की चीजें
जो यहां-वहां पडी‌ हैं
उन्हें संभालना अब
हमारी जिम्मेदारी है
बंटवारे में
हमारे हिस्से में मिली चीजों को
संभालकर रखने में निकल जाता है आधा दिन
अब वह
सबकी नहीं बल्कि
केवल हमारी सम्पत्ति का हिस्सा हैं।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस

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मैंने मित्र से पूछा
क्या बात है
हमसे छुप रहे हो
बहुत खुश दिख रहे हो?
मित्र बोला-
हाँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
इसलिए
देशभक्ति के गीत गा रहा हूँ
और
स्वतंत्रता दिवस मना रहा हूँ
मैंने कहा
लेकिन
आज तो स्वतंत्रता दिवस नहीं है!
मित्र बोला
यह सही है
कि
आज स्वतंत्रता दिवस नहीं है
लेकिन-
मुझे इस बात का गम नहीं है
क्योंकि
पत्नी का मायके जाना भी
किसी
स्वतंत्रता दिवस से कम नहीं है।

रविवार, 12 अगस्त 2012

पथप्रदर्शक

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हे धार्मिक पथप्रदर्शक
बिना संदेश दिए
बिना कुछ कहे
उठकर, कहां चल दिए

कहीं तुम
विश्राम तो नहीं करना चाहते हो
या
सृष्टि का अंत तो नहीं होने वाला
अथवा
महाप्रयाण की इच्छा है

हे मार्गदर्शी
तुम्हारे साथ
संवाद, संबोधन और सामीप्य ने
हमें
अब तक जीवित रखा
लेकिन
तुम्हारे प्रस्थान से संभव है
हम
कल की सुबह शायद न देख पाएं
इसलिए
तुम्हें नमन।

सोमवार, 30 जुलाई 2012

वसीयत (पुरस्कृत कविता)

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("हिन्द-युग्म" द्वारा जनवरी 2011 में आयोजित विश्वस्तरीय "यूनिकवि" काव्य प्रतियोगिता में 9 वां स्थान प्राप्त कविता)


जिंदगी भर
पिता ने
कवच बनकर
बेटे को सहेजा
लेकिन
पुत्र कोसता रहा
जन्मदाता पिता को
और
सोचता रहा
जाने कब लिखी जाएगी वसीयत मेरे नाम

पुत्र ने
युवावस्था में जिद की
और
बालहठ को दोहरा कर
फैल गया धुँए सा
पिता ने
गौतम बुद्ध की तरह शांत रहकर
अस्वीकृति व्यक्त की

कुछ देर
शांत रहने के बाद
हाथ से रेत की तरह फिसलते
बेटे को देखकर
पिता बोला
मेरी वसीयत के लिए
अभी तुम्हें करना होगा
अंतहीन इंतजार

कहते हुए
पिता की आँखों में था
भविष्य के प्रति डर
और
पुत्र की आँखों का मर चुका था पानी
भूल गया था वह
पिता द्वारा दिए गए
संस्कारों की श्रृंखला
अब नहीं जानता वह
अच्छे आचार-विचार
व्यवहार और
संस्कारों को मर्यादा में रखना
क्योंकि
यूरिया खाद
और
परमाणु युगों की संतानों का भविष्य
अनिश्चित है

नालायक हो गए हो तुम
भूल गए
तुम्हारे आँसुओं को हर बार
ओक में लिया है
जमीन पर नहीं गिरने दिया
अनमोल समझकर
पिता के भविष्य हो तुम
तुम्हारी वसीयती दृष्टि ने
पिता की सम्भावनाओं को
पंगु बना दिया है

तुमने
मर्यादित दीवार हटाकर
उसे कोष्ठक में बंद कर दिया
तुम्हारी संकरी सोच से
कई-कई रात
आँसुओं से मुँह धोया है उसने

तुम्हारी
वस्त्रहीन इच्छाओं के आगे
लाचार पिता
संख्याओं के बीच घिरे
दशमलव की तरह
घिरा पाता है स्वयं को
और
महसूस करता है
बंद आयताकार में
बिंदु सा अकेला
जहाँ
बंद है रास्ता निकास का

चेहरे के भाव से
देखी जा सकती है उसके अंदर
मीलों लम्बी उदासी
और
आँखों में धुंधुलापन
तुम्हारी हर अपेक्षा
उसके गले में कफ सी अटक चुकी है

तुम
पिता के लिए
एक हसीन सपना थे
जिसकी उंगली पकड़कर
जिंदगी के पार जाना चाहता था वह
तुम्हारी
असमय ढे‌रों इच्छाओं से
छलनी हो चुका है वह
और
रिस रहा है
नल के नीचे रखी
छेद वाली बाल्टी की तरह

आज तुम
बहुत खुश हो
मैं समझ गया
तुम्हारी इच्छाओं की बेडि‌यों से जकड़ा
पिता हार गया तुमसे
और
लिख दी वसीयत तुम्हारे नाम
अब तुम
निश्चिंत होकर
देख सकते हो बेहिसाब सपने।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

अम्मा और बाबूजी

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घर की ढेरों चीजें
जो व्यवस्थित रखी हैं
अपने-अपने स्थान पर
फिर भी
हम भूल जाते हैं
रखकर उन्हें
केवल दो ही लोग निभाते हैं
इस जिम्मेदारी को
अम्मा और बाबूजी
जो
आज हमारे साथ हैं

समय बीतते
साथ छोड़ दिया दोनों ने
अब हम
चीजों की जगह
अम्मा और बाबूजी को भूलने लगे हैं।

नदी की आत्महत्या

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नदी दुःखी है
सागर में समाने के बाद
बुरी तरह
फंस चुकी है
समुद्र के जाल में
खो चुकी है
स्वयं का अस्तित्व
खत्म हो चुके हैं
उसके किनारे
और
हलचल
समुद्र की हिलोरों में
कर चुकी है वह समर्पण

नदी को चलना ही होगा
समुद्र के प्रवाह के साथ
क्योंकि
एक पूरी नदी
खाली हो चुकी है समुद्र में
और
पूरी तरह
समुद्र थोप चुका है
नदी पर अपनी इच्छाएं
और अब
नदी को भी हो चुका है
समुद्र में समाने की
अपनी गलती का अहसास

नदी का
समुद्र में समाना तो
एक सदियों पुरानी परंपरा है

नदी को
स्त्री के रूप में
समुद्र के आगे
झुकना ही होगा
सशर्त समझौता होता
तो भी ठीक था
लेकिन
शर्त कोई नहीं
बस
कट्टरपंथी समुद्र के आगे
केवल और केवल
समझौता ही करना है
समझ नहीं आता
नदी का समुद्र में समाना
एक हादसा था
या
नदी की आत्महत्या
फिर भी
मुझे लगता है
समुद्र में समाने के बाद
नदी को महसूस नहीं किया जा सकता
न ही
सुनी जा सकती हैं उसकी सिसकियाँ
इसलिए
यह आत्महत्या ही है।