ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। मेरे समर्थक (Follower) बनकर मुझसे जुड़ें। मेरी पुस्तकें ऑनलाइन खरीदें अथवा संपर्क करें। WhatsApp: 9451169407 | 8953165089 | इस ब्लॉग की समस्त रचनाओं के © सर्वाधिकार सुधीर गुप्ता ‘चक्र’ के पास सुरक्षित हैं।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

नदी की आत्महत्या

0 टिप्पणियाँ

नदी दुःखी है
सागर में समाने के बाद
बुरी तरह
फंस चुकी है
समुद्र के जाल में
खो चुकी है
स्वयं का अस्तित्व
खत्म हो चुके हैं
उसके किनारे
और
हलचल
समुद्र की हिलोरों में
कर चुकी है वह समर्पण

नदी को चलना ही होगा
समुद्र के प्रवाह के साथ
क्योंकि
एक पूरी नदी
खाली हो चुकी है समुद्र में
और
पूरी तरह
समुद्र थोप चुका है
नदी पर अपनी इच्छाएं
और अब
नदी को भी हो चुका है
समुद्र में समाने की
अपनी गलती का अहसास

नदी का
समुद्र में समाना तो
एक सदियों पुरानी परंपरा है

नदी को
स्त्री के रूप में
समुद्र के आगे
झुकना ही होगा
सशर्त समझौता होता
तो भी ठीक था
लेकिन
शर्त कोई नहीं
बस
कट्टरपंथी समुद्र के आगे
केवल और केवल
समझौता ही करना है
समझ नहीं आता
नदी का समुद्र में समाना
एक हादसा था
या
नदी की आत्महत्या
फिर भी
मुझे लगता है
समुद्र में समाने के बाद
नदी को महसूस नहीं किया जा सकता
न ही
सुनी जा सकती हैं उसकी सिसकियाँ
इसलिए
यह आत्महत्या ही है। 

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

तुम कब आओगे पता नहीं

0 टिप्पणियाँ

तुम
कब आओगे
पता नहीं
साठ डिग्री तक
पैरों को मोड़कर
और
पीठ का
कर्व बनाकर
दोनों घुटनों के बीच
सिर रखकर
एक लक्ष्य दिशा की ओर
खुले हुए स्थिर पलकों से
बाट जोहती हूँ तुम्हारी
तुम
कब आओगे
पता नहीं

दोनों पलकों के बीच
तुम्हारे इंतजार का
हाइड्रोलिक प्रेशर वाला जेक
पलक झपकने नहीं देता

दूर दृष्टि का
माइनस फाइव वाला
मोटा चश्मा चढ़ा होने पर भी
बिना चश्मे के ही
दूर तक
देख सकती हूँ मैं तुमको
लेकिन
तुम
कब आओगे
पता नहीं

एकदम सीधी
और
शांत होकर चलने वाली
डी सी करण्ट की तरह
ह्रदय की धड‌कन का प्रवाह
तुम्हारे आने की संभावना से
ऊबड़-खाबड़
ए सी करण्ट में बदलकर
ह्रदय की गति को
अनियंत्रित कर देता है
लेकिन
जब संभावना भी खत्म हो जाती है
तब लगता है
ज्यामिति में
अनेक कोण होते हैं
इसलिए
क्यों न लम्बवत् होकर
एक सौ अस्सी डिग्री का कोण बनाऊं
और
थक चुकी आंखों को
बंद करके सो जाऊं
क्योंकि
तुम
कब आओगे
पता नहीं।

कवि का दुःख (पुरस्कृत कविता)

0 टिप्पणियाँ

(“हिन्द-युग्म” द्वारा अगस्त 2010 में आयोजित विश्वस्तरीय “यूनिकवि” काव्य प्रतियोगिता में आठवां स्थान प्राप्त)


अगर
भूल जाऊँ कविता लिखना
तो
शीत की तरह
उभर आएँगे
स्मृति पटल पर
तमाम दुःख
शोक और
मानवीय संवेदनाओं के
मिले‌‌-जुले भाव
और
तब
हवा के थपेड़ों से पिटती हुई
अनिश्चित गंतव्य की ओर
चलती हुई नाव
और
उसमें प्रथम बार यात्रा कर रहे
सहमे हुए यात्री की आँखों से
निकल आएँगे अश्रु
और
पेट में उठेगा
ज्वार-भाटे सा दर्द
माथे पर होंगे
मिश्रित भाव
तब
शर्म से
समा जाएगी धरती
आकाश में या
पुनः स्मरण हो आएगी
कवि को कविता।

रविवार, 10 जून 2012

हम किन्नर हैं (आम आदमी के प्रति)

0 टिप्पणियाँ
हम किन्नर हैं
हाँ
हम किन्नर ही हैं और
निःसंकोच कहते हैं
कि
हम किन्नर हैं
तुम
अपने संस्कारों को भूलकर
नारी के प्रति
अपने ही हाथों से
अपनी मर्यादा का गर्भपात कर चुके हो
इसलिए कैसे कह सकते हो कि
नारी ने तुम्हें एक पूर्ण इंसान के रूप में जन्म दिया है
हम अर्धविकसित या अविकसित ही सही
लेकिन
गर्व से कहते हैं कि
हमें नारी ने ही जन्म दिया है
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
दो आँख, दो कान
दो हाथ और दो पैर
सब कुछ तुम्हारे जैसा ही तो है
खुशी तो इस बात की है कि
इंद्रियों को वश में रखने का विशेष गुण
विधाता ने
केवल हमें ही दिया है
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
तुम
मर्द होने का अहम और
औरत के सुंदर होने के बीच की
संकीर्ण मानसिकता से कभी नहीं उभर सकते
यहां भी ऊपर वाले ने हमारा बखूबी ध्यान रखा है
क्योंकि हमारे यहां समानता है
हर कोई एक जैसा होता है
एक जैसा दिखता है
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
नौनिहालों के स्तनपान की अनदेखी करके
घर की हद लांघकर
सरकारी वैशाखी के सहारे
आज तुम्हारी औरतें
मर्दों के साथ
बराबरी का हक मांगकर
उसके साथ कंधे से कंधा मिलाने के लिए लड़ रही हैं और
हमारे यहां इस तरह की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
तुम अपनी संतान भी ठीक से नहीं पाल सके और
तुम कभी भी नहीं सीख सके
किसी गैर को आशीर्वाद देना
या यह कहना कि
दूधो नहाओ पूतो फलो
क्योंकि
विधाता को तुम पर विश्वास ही नहीं था
इसलिए
यह विशेष गुण भी विधाता ने हमें ही दिया है
तुम्हारे बच्चों को हम पहले अपने आँचल में रखते हैं
फिर आशीर्वाद भी देते हैं
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
तुम्हारी नंगी सभ्यता से अच्छी थी
हडप्पा की सभ्यता और
सिंधु घाटी की सभ्यता
क्योंकि तुम्हारे और हमारे बीच का शारीरिक अंतर
तुम्हारी संकीर्ण सोच वाले अविकसित मस्तिष्क में
हमेशा द्वंद पैदा करता रहा
और तुम्हें सोने नहीं दिया रात भर
हमें भले ही तुम्हारी सभ्यताओं के साथ संघर्ष करना पडा
लेकिन सदियों पुरानी हमारी सभयता आज भी जीवित है
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
इतिहास गवाह है
हमारी पीढियां
तुम्हारे रहमोकरम पर
कभी भी नहीं पली
क्योंकि
तुमने हमें जो भी दिया है
उसका कुछ न कुछ मूल्य अवश्य था
लेकिन हमने तुम्हारी हर पीढी को अपना
अनमोल आशीर्वाद दिया है
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं
हृदय में
असहनीय और अभद्र टिप्पणियों की
कटाक्ष शिला रखकर
तमाम अनसुलझे प्रश्न
तुम्हारे खाली हो चुके मस्तिष्क में मथते रहते हैं
गर्भधारण न कर पाना हमारी शारीरिक नपुंसकता नहीं
बल्कि तुम्हारी मानसिक नपुंसकता है
क्योंकि शरीर से अधिक मन की नपुंसकता खतरनाक होती है
इसलिए हम बहुत खुश हैं
भले ही हम किन्नर हैं।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

उम्मीदें क्यों?

0 टिप्पणियाँ




उम्मीदें क्यों ? 

उम्मीदों पर खरा उतरने वाला काव्य संग्रह 



अरे ! हम तो फिसल गए

0 टिप्पणियाँ

अरे ! हम तो फिसल गए

  व्यंग्यात्मक चेतावनी वाला 
हास्य-व्यंग्य से भरपूर अनूठा काव्य संग्रह