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शुक्रवार, 13 मई 2011

टाइम पास आशिक

आजकल

धनाड्य घरों की लड‌‌कियाँ भी

कार से जाने की जगह

बस स्टॉप से चढ़ना पसंद करती हैं

क्योंकि

प्रेमी ढूँढने के लिए

बस के इंतजार में

परिचय अपने आप हो जाता है

और

पेंग भी

अपने आप बढ़ जाती हैं

फिर

आँख की पुतली से

विभिन्न कोणों का प्रयोग करते हुए

ढूँढ ही लेती हैं

टाइम पास आशिक को

जिसने

नहीं भरा महीने भर से

मकान का किराया

हो सकता है

गरीब हो वह

लेकिन

प्रेमिका के साथ

हर रोज खर्च होता है

एक हरा नोट

और

उधार के स्टेटस की खातिर

वेटर को

टिप में देना पड़ता है

बचा हुआ दस का नोट

जिससे खरीदा जा सकता है

अँधेरे कमरे के लिए एक बल्ब

शाम को लौटते वक्त

कभी नहीं भूलती प्रेमिकाएं

गोलगप्पे या भेलपूरी खाना

पैसे देते वक्त

प्रेमी का बढ़ जाता है रक्तचाप

क्योंकि

खाली पर्स मुँह चिढ़ाकर

झूठ बुलवा ही देता है

सॉरी डार्लिंग

किसी ने पर्स मार दिया

तब

बुझा मन और

थकान भरा चेहरा लिए

घर पहुँचने पर

नहीं आती नींद

क्योंकि

हर रोज की तरह

कल सुबह फिर होगी बेइज्जती

और

किराया नहीं मिलने पर होगी

सामान जब्त करने की धमकी

आधी रात बीतने पर भी

नींद कोसों दूर है

फिर भी

नहीं है कोई दुःख

किसी बात का

क्योंकि

प्रेमिका केंद्रित हो चुकी है

आँखों की पुतलियों में।

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